राष्ट्रीय खेल दिवस की पूर्व संध्या पर भारतीयता मे खेलो का समावेश तथा वैश्विक पटल पर खेलों के माध्यम से भारत की बढती मांग एवं अर्थतंत्र पर पडने वाला प्रभाव भारत के लिए किसी नवक्रान्ति से कम नही है

दीपक मिश्रा 

हरिद्वार- राष्ट्रीय खेल दिवस की पूर्व संध्या पर भारतीयता मे खेलो का समावेश तथा वैश्विक पटल पर खेलों के माध्यम से भारत की बढती मांग एवं अर्थतंत्र पर पडने वाला प्रभाव भारत के लिए किसी नवक्रान्ति से कम नही है। गुरुकुल कांगडी समविश्वविद्यालय के शारीरिक शिक्षा एवं खेल विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ0 शिवकुमार चौहान ने खेल तथा साहसिक खेल गतिविधियों को जीवन मूल्य एवं स्वास्थय से जुडे विषयों मे अग्रणी स्थान प्राप्त होने को भारतीय संस्कृति की विशेषता का प्रमुख केन्द्र बताया। नवप्रवेशी प्रशिक्षुओं को जीवन के मार्मिक रहस्य तथा शिक्षा के प्रति संवेदनशील एवं प्रेरणादायक तथयों पर उपस्थित प्रशिक्षुओं का मार्गदर्शन किया। अपने सम्बोधन मे डॉ0 शिवकुमार चौहान ने कहॉ कि प्राचीन खेल गतिविधियों मे मल्लख्ंाभ, जिम्नास्टिक, घुडसवारी, तलवारबाजी, इन्डीजिनियस क्रियाकलाप, मुक्त हस्त गतिविधियॉ स्वस्थय तथा कुशल जीवन की प्राथमिकी निर्धारित करने का पर्याय होती थी। ये गतिविधियॉ आज भी जीवन को स्वास्थय उन्मुख बनाने मे कारगर है।
खेल जैसी विद्या संस्कारित एवं अनुशासित श्रेष्ठ नागरिकों का निर्माण करने वाली पाठशाला मानी जाती है। जहां जन्मजात बच्चें की शारीरिक बनावट तथा उसका खेल सम्बंध पहचान कर सामथर्य एवं शक्ति के गुणों को विकसित करने की क्रियाओं जीवन का हिस्सा बनाया जाता है। गुरूकुलीय व्यवस्था इसमे सबसे अधिक कारगर सिद्व होती है। जिसके प्रभाव को उपयोगी मानकर हनुमान व्यायाम प्रसार मण्डल तथा वाई0एम0सी0ए0 जैसी संस्थाओं मे ब्रहमचर्य का पालन कराते हुये साहसिक खेलों का प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन से जुडी मुख्य गतिविधियों के आयोज की व्यवस्था सम्भव हो सकी। इसी परम्परा का अनुसरण करते हुये देश मे अग्रणी खिलाडियों ने अखाडा कुश्तियों से प्रशिक्षण प्राप्त करके बेहतर मुकाम हासिल किया। सन् 1952 मे इसी अखाडा कुश्ती से निकलकर के0डी0जाधव ने स्वतंत्र भारत के लिए ओलम्पिक मे पहला कांस्य पदक जीता। अखाडें की परम्पराओं से दंड-बैठक के दम पर 50 साल के करियर मे पहलवानी करके द ग्रेट गामा पहलवान (गुलाम मोहम्मद बख्श बटट) जिन्होने बिना कोई मैच हारे का कीर्तिमान बनाकर भारत की संस्कृति एवं परम्पराओं का सम्मानित करने का काम किया। इसी क्रम मे मल्लख्ंाभ मे सर्वश्रेष्ठ और जानेमाने खिलाडी दीपक शिन्दे विश्व चैम्पियन का खिताब जीता। वर्तमान ने शौर्यजीत खैरे ने (10 वर्ष की अल्प आयु) मे जीतकर चर्चा मे आये, बाद मे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी उनके प्रदर्शन को सराहा। संतोष शोरे और राकेश कुमार बरदा, छतीसगढ ने विश्व चैम्पियनशिप तथा नेशनल गेम्स गोल्ड मेंडल जीते।आरचर लिम्बा राम ैने सन् 1992 मे वर्ड रिकॉर्ड की बराबरी करने वाले खिलाडी तैयार किये जा सकते है। सी0एव भावली देवी ने तलवारबाजी प्रतियोगिता की सीनियर तलवारबाजी प्रतियोगिता मे गोल्ड मेंडल अर्जित किया। हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यान चन्द जैसी हस्तिायॉ जिन्होने खेलों के लिए नये मानक स्थापित किये तथा देश की गौरव गाथा का गुणगान किया है। गुरूकुलीय परम्परा निर्वहन मे ऐसे प्रयास सार्थक होते रहे इसके लिए युवाओं को देश हित मे और अधिक हुनरमद एवं कुशल बनाना पडेगा। ओलम्पिक, विश्व चैम्पियनशिप, कॉमन वैल्थ गेम्स, नेशनल गेम्स, सीनियर नेशनल, स्टेट चैम्पियनशिप एवं अन्य प्रतिष्ठित प्रतियोगिताओं मे अपनी कुशलता को बढाने का काम कर रहे है। इस कुशलता से परिणाम तथा सिद्वि भी प्राप्त हो रही है। जिसके परिणाम स्वरूप विश्व स्तर पर भारत की प्रसिद्वि दिनों दिन बढती जा रही है। आज देश मे अर्थतंत्र, राजतंत्र तथा विज्ञान की कुशलता से रचनात्मक एवं प्रगतिशील बदलाव होने से भारत की बसुधैव कुटुम्बकम के साथ सर्व भवन्तु सुखिनः सर्व सन्तु निरामया, सर्व भद्राणी पश्चयन्तु, मां कश्चिद दुखः भाग भवेत का भाव विश्व शान्ति की कामना को बल प्रदान करता है, जो भारत के विश्वगुरू बनने की संकल्पना को साकार रूप प्रदान कर सकता है।

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