दीपक मिश्रा
हरिद्वार। भाषा की ताकत और उसके सामाजिक-मानसिक प्रभाव पर केंद्रित पुस्तक ‘अपशब्द की व्याख्या’ केवल एक वैचारिक कृति नहीं, बल्कि हरिद्वार से जुड़े संस्कारों का प्रतिबिंब भी है। इसके रचनाकार देवेश चन्द्र प्रसाद का जीवन, शिक्षा और वैचारिक निर्माण लंबे समय से धर्मनगरी हरिद्वार में हुआ है, जिसकी छाप उनकी लेखनी में साफ झलकती है।
वर्ष 1972 में पिता के बीएचईएल, हरिद्वार स्थानांतरण के बाद परिवार यहीं बस गया। इसके बाद हरिद्वार ही देवेश चन्द्र प्रसाद की कर्मभूमि और संस्कारभूमि बना। प्रारंभिक शिक्षा से लेकर मास्टर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशन तक की पढ़ाई उन्होंने यहीं रहकर पूरी की। गंगा नगरी का सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक वातावरण उनके व्यक्तित्व को निरंतर दिशा देता रहा।
‘अपशब्द की व्याख्या’ में देवेश चन्द्र प्रसाद ने स्पष्ट किया है कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता का आईना होती है। अभद्र और कुटिल शब्द व्यक्ति के आत्मविश्वास को कमजोर करते हैं और नकारात्मकता को जन्म देते हैं, जबकि संयमित और मधुर वाणी सकारात्मक माहौल, आपसी सौहार्द और सफलता की ओर ले जाती है। यह दृष्टिकोण हरिद्वार जैसे सांस्कृतिक नगर में पले-बढ़े व्यक्ति की संवेदनशील सोच को दर्शाता है।
पुस्तक में अपशब्दों के प्रयोग के पीछे गुस्सा, निराशा, मानसिक तनाव और अस्तित्वगत भय जैसे कारणों को सरल भाषा में समझाया गया है। यह भी रेखांकित किया गया है कि अपशब्द महज शब्द नहीं, बल्कि व्यक्ति की मानसिक स्थिति और सामाजिक व्यवहार को उजागर करते हैं।
वर्तमान में देवेश चन्द्र प्रसाद केंद्र सरकार में अनुभाग अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। प्रशासनिक दायित्वों के बावजूद उनका जुड़ाव हरिद्वार से बना हुआ है। लेखन के साथ-साथ गिटार बजाना, सुडोकू खेलना और बागवानी उनकी रुचियों में शामिल है।
पहली कृति ‘अपशब्द की व्याख्या’ के जरिए देवेश चन्द्र प्रसाद ने सकारात्मक और संयमित संवाद की आवश्यकता को मजबूती से सामने रखा है। हरिद्वार की सांस्कृतिक चेतना से उपजी यह पुस्तक पाठकों को शब्दों के चयन के प्रति सजग रहने का संदेश देती है।