सातवें स्थापना दिवस पर ‘परिक्रमा’ काव्य गोष्ठी

दीपक मिश्रा 

‌‌‌‌हरिद्वार। नगर की अग्रणी साहित्यिक संस्था परिक्रमा साहित्यिक मंच’ ने अपने सातवें स्थापना दिवस पर सैक्टर-5 बी, भेल स्थित जूनियर इंजीनियर एण्ड आफीसर कार्यालय में एक वासंतिक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें भाग लेने पधारे अनेक सिद्धहस्त तथा नवोदित युवा कवि एवं कवियित्रियों ने माँ वीणापाणि को अपने कृतज्ञ शब्द पुष्प अर्पित किये, तो ऋतुराज बसंत के स्वागत में मधुर स्वर भी छेड़े, देशभक्ति और श्रृंगार रस के भाव जगाकर ख़ूब तालियाँ बटोरीं।
माँ सरस्वती के विग्रह के समक्ष दीप प्रज्वलन, माल्यार्पण व पुष्पार्पण के बाद राजकुमारी राजेश्वरी की वाणी वंदनस ‘माँ सरस्वती शारदे, शारदे’ से प्रारम्भ होकर देर शाम तक चलती रही इस गोष्ठी में कवि सुरेन्द्र कुमार ने ‘सुरेन्द्र कुमार ‘तू ही राह दिखा दे मैय्या, कैसे करूँ मैं तेरा वंदन’ व सचिव शशि रंजन ‘समदर्शी’ ने ‘शारदे की साधना हो ज्ञान की आराधना हो, कविता में सत्य की पुकार होनी चाहिए’ माँ के चरणों‌ में अपने भाव रखे तो चेतना पथ के सम्पादक व गीतकार अरुण कुमार पाठक ने माँ वीणापाणि से ‘तुम्हारे ज्ञान से देवी, ये कुल दुनियाँ प्रकाशित हो, मिले अज्ञानी को प्रज्ञा, तुम्हारी  वह  विरासत हो’ का वरदान‌ माँगा। बिजनौर से पधारे कवि कर्मवीर सिंह ने ‘वाणी को‌ नमन वीणा को नमन, कविता को नमन सविता को नमन’ के साथ माँ को नमन किया।
वरिष्ठ गीतकार व पारिजात के अध्यक्ष सुभाष मलिक‌ने कहा ‘धूप आँगन की बहुत शर्मा रही है, मस्त हो मधुमास कोयल गा रही है’, डा० सुशील कुमार त्यागी ‘अमित’ – दसों दिशाएँ स्वागत करतीं सुखमय सब संसार है, हे ऋतुराज तुम्हीं से जनमन जीवन‌ का संभार है’, राजकुमारी ‘राजेश्वरी’ ने ‘तप्त तन के दे गया कल मेघ पानी, ओढ़ ली चूनर धरा ने आज धानी’, चित्रा शर्मा ने ‘क्यों आए ऋतुराज बसंत, किसने तुम्हें बुलाया है’, गोष्ठी अध्यक्ष व वरिष्ठ कवि कुंअर पाल सिंह ‘धवल’ ने ‘चर्चा है गलियन‌में बाग और बगियन में एक बार सखी फिर आयो बसंत है’, कल्पना कुशवाहा ने ‘सुभाषिनी’ ‘है बसंती ये बयार कह रही है कर ले प्यार’ तथा गोष्ठी का कुशलतापूर्वक संचालन कर रहेगोष्ठी का कुशल संचालन करते हुए वरिष्ठ कवि मदन सिंह यादव ने ‘ऋतु की शान निराली है, हर दिशा हुई मतवाली है’ सुनाकर ऋतुराज बसंत का सस्वर स्वागत किया।
प्रेम शंकर शर्मा ‘प्रेमी’ ने माँ की महिमा गाता सारा देश है’ के साथ मातृभूमि को नमन किया तो संजीव शर्मा ‘अंश’ ने ‘कुछ बेटियाँ भी खो गयीं थीं, कुछ लाल भी छिन गये थे’ कह कर युद्ध के मैदान में शहीदों के बलिदान को याद किया। बिजनौर के रविन्द्र कुमार ने स्वरचित काव्य गीता के भाव रखे तो युव कवि अभिषेक भारद्वाज ने ‘उजड़ रहे हैं आशियाने पंछियों‌ के इंसानों‌ में कुछ बात हुई है’ वृक्षों की कटान पर परिन्दों‌का दर्द बयाँ किया।‌ देवेन्द्र मिश्र ने ‘मन‌ का चाहा कब होता है, चाहा कुछ तो‌ कुछ होता है’ तथा महेन्द्र कुमार ‘माही’ ‘वक्त ने हमसे यूँ फ़रमाया, क्या इक सच्चा बंद लिखोगे’ सुना कर मानव दर्शन समझाया।‌
बंदना झा ने ‘गाँव की गलियाँ सूनी हैं, शहर की सड़कें हाॅफ़ रही हैं’ कह कर गाँव से शहर को हो रहे पलायन की बात की तो युवा जोश के कवि अरविन्द दुबे ने‌ अपनी प्रेरक काव्य रचना ‘मदद गर एक की कर दो सुधरती ही नहीं दुनिया, यही बस सोच कर घर से निकलते ही‌ नहीं दुनिया’ प्रस्तुत कर वह वाही लूटी।

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