दीपक मिश्रा
भारतीय चिकित्सा विज्ञान के स्वर्णिम इतिहास में महर्षि सुश्रुत का नाम अद्वितीय सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्हें विश्व का प्रथम शल्य चिकित्सक (Father of Surgery) माना जाता है। लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व उन्होंने शल्य चिकित्सा को वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हुए अनेक ऐसी विधियों का वर्णन किया, जिनका आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी अनुसरण करता है। उनका महान ग्रंथ ‘सुश्रुत संहिता’ आज भी शल्य विज्ञान का आधारभूत ग्रंथ माना जाता है।
सुश्रुत संहिता में लगभग 300 से अधिक शल्य क्रियाओं, 120 से अधिक शल्य उपकरणों तथा अनेक प्रकार के अस्थिभंग, घाव, नेत्र, नाक, कान एवं मूत्ररोगों की शल्य चिकित्सा का विस्तृत एवं वैज्ञानिक वर्णन मिलता है। विशेष रूप से नासा पुनर्निर्माण (Rhinoplasty), मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा, प्रसूति एवं आघात चिकित्सा संबंधी उनके सिद्धांत आधुनिक सर्जरी के विकास में मील का पत्थर सिद्ध हुए हैं। रोगी की सुरक्षा, स्वच्छता, शल्य उपकरणों की शुद्धता तथा शल्य चिकित्सक के नैतिक आचरण पर उनके विचार आज भी चिकित्सा जगत के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं।
इस अवसर पर आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. अवनीश कुमार उपाध्याय ने कहा कि महर्षि सुश्रुत केवल एक महान शल्य चिकित्सक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले ऐसे ऋषि थे जिन्होंने चिकित्सा को प्रयोग, प्रशिक्षण और नैतिक मूल्यों से जोड़ा। उन्होंने विद्यार्थियों को वास्तविक शल्य चिकित्सा से पूर्व फल, सब्जियों, मोम तथा पशुओं के अंगों पर अभ्यास करने की शिक्षा दी, जो आज की सर्जिकल स्किल ट्रेनिंग की मूल अवधारणा से मेल खाती है। डॉ. उपाध्याय ने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि आयुर्वेद के वैज्ञानिक एवं प्रमाण आधारित ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाया जाए तथा युवा चिकित्सकों को महर्षि सुश्रुत की विरासत से परिचित कराया जाए। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद केवल रोग उपचार की नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन, रोग-निवारण और समग्र स्वास्थ्य संरक्षण की जीवनदृष्टि प्रदान करता है।
जिला आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी, हरिद्वार डॉ. स्वास्तिक सुरेश ने बताया कि हरिद्वार जनपद के आयुर्वेद उत्कर्ष केंद्र (शल्य चिकित्सा), बहादराबाद में आयुर्वेदिक शल्य एवं क्षारसूत्र चिकित्सा की आधुनिक सुविधाओं के साथ गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ प्रदान की जा रही हैं। केंद्र में विशेष रूप से भगंदर (Fistula-in-Ano), अर्श (Piles), फिशर (Anal Fissure), पाइलोनाइडल साइनस, दीर्घकालिक घाव, विभिन्न प्रकार की गांठों तथा चयनित शल्य रोगों का आयुर्वेदिक सिद्धांतों एवं आधुनिक मानकों के अनुरूप उपचार किया जाता है। क्षारसूत्र पद्धति जैसी आयुर्वेद की विशिष्ट एवं प्रभावी तकनीक के माध्यम से अनेक रोगियों को सफल उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि आयुर्वेद उत्कर्ष केंद्र में प्रशिक्षित विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा परामर्श, शल्य चिकित्सा, क्षारसूत्र उपचार तथा ऑपरेशन के उपरांत समुचित देखभाल की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। यह केंद्र जनसामान्य को कम लागत में सुरक्षित, प्रभावी एवं वैज्ञानिक आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है तथा प्रदेश में आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
महर्षि सुश्रुत जयंती केवल एक महापुरुष के स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि भारतीय चिकित्सा ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिकता, समृद्धि और वैश्विक योगदान को पुनः स्थापित करने का भी अवसर है। आज जब विश्व समग्र एवं समन्वित चिकित्सा पद्धतियों की ओर अग्रसर है, तब महर्षि सुश्रुत के सिद्धांत और आयुर्वेद की शल्य परंपरा मानव स्वास्थ्य के लिए पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है। आवश्यकता है कि इस अमूल्य धरोहर का संरक्षण, संवर्धन और वैज्ञानिक शोध के माध्यम से व्यापक प्रसार किया जाए, जिससे भारत की प्राचीन चिकित्सा परंपरा वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में और अधिक प्रभावी योगदान दे सके।