दीपक मिश्रा
हरिद्वार- दिनचर्या तथा ऋतुचर्या स्वास्थ्य के दो महत्वपूर्ण पहलू है। एक के प्रभावित होने से दूसरा स्वतः अपनी प्रकृति बदल देता है। यह बदलाव इतनी तेजी से होता है कि दूसरे को प्रभाव रोकने का अवसर नही मिल पाता। गुरुकुल कांगडी समविश्वविद्यालय, हरिद्वार के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ0 शिवकुमार चौहान ने स्वास्थ्य पर ऋतुचर्या का प्रभाव विषय पर आयोजित कार्यशाला के अवसर पर बतौर विषय प्रवर्तक यह बात कही। अभयुदय सामाजिक संस्था, सहारनपुर द्वारा सहारनपुर के एक बैंकेट हॉल मे आयोजित इस कार्यशाला मे स्वास्थ्य, चिकित्सा, आयुर्वेद, मनोविज्ञान तथा योग के क्षेत्र मे कार्य कर रहे विद्वानों को इस कार्यशाला मे बतौर विषय विशेषज्ञ आमंत्रित किया। कार्यशाला का शुभारम्भ भगवान धन्वन्तरि के चित्र पर पुष्प अर्पित तथा दीप-प्रज्ज्वलन के माध्यम से सम्पन्न हुआ। कार्यशाला की विषय प्रस्तावना पर बोलते हुये डॉ0 शिवकुमार चौहान ने कहॉ कि पृथ्वी की सूर्य परिक्रमा और अक्षीय झुकाव के कारण मौसम चक्र बदलता है, जो कृषि पारिस्थितिकी तंत्र, जलवायु संतुलन और जीवनशैली के साथ खान-पान को निर्धारित करता है। डॉ0 चौहान ने कहॉ कि ़ऋतुएं व्यक्ति के जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करती है। ऋतुओं के अनुसार भोजन द्वारा प्राप्त पोषक तत्वों का शरीर पर प्रभाव भी भिन्न भिन्न होता है। भारतीय संस्कृति और पंचांग मे वर्ष को छह मुख्य ़ऋतुओं मे रखा गया है। ऋतुओं मे बदलाव से ही पृथ्वी पर जल-चक्र चलता है। हिन्दुस्तान कृषि प्रधान देश है, जिसके लिए ऋतुएं अपनी विशिष्टता रखती है। आषाढ-श्रावण (जून-अगस्त) मास में वर्षा की अधिकता एक ओर बुवाई के लिए जल प्रदान करती है, वही दूसरी ओर भूमि मे जल स्तर को रिचार्ज करने का काम करती है।
डॉ0 चौहान ने कहॉ कि भारत की विविधता उसकी ऋतुओं के कारण व्यक्ति के जीवन मे उत्साह एवं नई ऊर्जा का संचार करती है। कार्यशाला का संचालन डॉ0 रमेश शर्मा द्वारा किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष एवं कार्यशाला के संयोजक चिकित्साविद्व केहर सिंह द्वारा की गई।इस अवसर पर डॉ0 अंजलि शर्मा, डॉ0 प्रतीक सिंह, डॉ0 भावना सहगल, प्रो0 सोहन लाल, डॉ0 विनय कुमार, आर्यन योगी आदि उपस्थित रहे। कार्यशाला मे ऑन-लाईन तथा ऑफ-लाईन दोनो माध्यमों से प्रतिभागियों तथा विशेषज्ञों ने भाग लिया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ0 भावना सहगल द्वारा किया गया।