राज्य स्थापना दिवस पर उत्तराखंड राज्य के 24 साल पूर्ण 

दीपक मिश्रा 

 

*चौबीस साल का उत्तराखंड* वरिष्ठ पत्रकार रतन मनी डोभाल ने राज्य स्थापना दिवस पर राज्य की वर्तमान स्थिति पर विचार प्रकट करते हुए कहा कि
नौ नवंबर 2024 को उत्तराखंड राज्य 24 साल का हो गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 2025 में उत्तराखंड राज्य को देश का अग्रणी राज्य बनाने की घोषणा की थी। इससे पहले मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक स्वीटजरलैंड बनाने वाले थे। हरीश रावत को छोड़ सभी जिंदा व मुर्दा मुख्यमंत्री भाजपा के रहे। एक तो पांच साल कांग्रेस का मुख्यमंत्री रहा। मरने के लिए ही भाजपा में गया। एक अन्य को मुख्यमंत्री कांग्रेस ने ही बनाया पर उसने बुढ़ापे लाठी भाजपा को बनाया है। प्रथम मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को भाजपा ने ही हरियाणा का प्रमाण देकर कुर्सी से गिराया। सबकी अपनी अपनी प्राथमिकताएं रही। उत्तरांचल से उत्तराखंड नाम मिला पर राज्य उत्तराखंड नही गया। सब्बी धाड़ी। देश का यह अकेला ऐसा राज्य जिसकी तीसरी विधानसभा बननी प्रस्तावित है पर उसकी अपनी स्थायी राजधानी नही है।
आईए जरा पीछे मुड़ के देखते हैं। अलग राज्य बनने से पहले उत्तर प्रदेश के प्रवेश क्षेत्र की जनता निरंतर विकास के बहुआयामी सवालों को लेकर आंदोलन आंदोलन रही है। राज्य के लिए चलने वाले आंदोलन का एक प्रमुख आधार विकास की दौड़ में अन्य क्षेत्रों से बिछड़ना तथा स्वाधीनता के बाद विकास के लाभ न मिलाना भी था। एक बार नहीं बल्कि कई बार जनआंदोलनकारी शक्तियां सत्तारूढ अभिजात वर्ग के साथ टकराई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्ववर्ती काल में इन्ही आंदोलन ने उत्तराखंड के निर्माण को राष्ट्र की मुख्य आंदोलनकारी धारा से जोड़ा। इसी ने राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन की प्रत्येक धारा के अंदर उत्तराखंड की जनता के प्रगतिशील हिस्सों ने सिद्धत के साथ हिस्सेदारी की है। जंगल के हकों के लिए संघर्ष तो मानों पर्वतीय जनों को विरासत में ही मिले हैं। किसान समुदाय के बेगार विरोधी आंदोलन, अनुसूचित जातियों के डोला पालकी आंदोलन, रवाई कांड, राजशाही के खिलाफ टिहरी रियासत की जंनक्रांति उत्तराखंड की जनता की सांस्कृतिक धरोहर बन चुके हैं। यह वह विरासत है जिसकी नीव पर आज उत्तराखंड खड़ा है और इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए विकास को बहुआयामी चुनौतियों को उत्तराखंड की जनता को आगे बढ़ाना है।
इन आंदोलनों में महिलाओं किसानों, भूतपूर्व फौजियों, छात्रों, नौजवानों की भागीदारी उल्लेखनीय रही है। यही वह समाज के प्रमुख हिस्से हैं जिनके लिए विकास होना है। जिन तक प्रगतिशील आधुनिक समाज के खुशनुमा सपनों को पहुंचना है।
आज भी पीने पानी तथा राशन की दुकानों में अन्न सहित सभी आवश्यक वस्तुओ की उपलब्धता के सवाल जहां के तहां खड़े हैं।
1946 में इन्हीं प्रमुख सवालों को उठाते हुए पेशावर विद्रोह के नायक कामरेड चंद्र सिंह गढ़वाली ने रानीखेत में कम्युनिस्ट पार्टी का कार्य प्रारंभ किया था।
सच तो यह है कि 1962 से पहले इस पूरे भू-भाग में सड़कों, विद्यालयों और अन्य आधुनिक गतिविधियों का पूर्ण अभाव था। क्षेत्र के विकास में व्याप्त असमानता, प्रशासन में विकेंद्रीकरण, आधुनिक उद्योगों की स्थापना, नए नागरिक केंद्रों स्थापना आदि कामरेड चंद्र सिंह गढ़वाली द्वारा माननीय गोविंद बल्लभ पंत जी को पौड़ी में दिए गए ज्ञापन की प्रमुख मांगे थी। इसी प्रकार कोटद्वार से पौड़ी तक मोटर मार्ग बनाने की मां 30 के दशक में “जागृत गढ़वाल”आंदोलन ने उठाई थी। संघर्षों के निरंतर चलने वाली विशिष्ट श्रृंखला ने तथा समय-समय पर राजसत्ता के निर्मम दमन के चलते इस पर्वतीय क्षेत्र की जनता के सांस्कृतिक पहचान पुष्ट हुई है । विश्वविद्यालय आंदोलन, क्षेत्रीय दलों का गठन व उत्तराखंड राज्य आंदोलन के द्वारा इस पहचान की अभिव्यक्ति हुई। 1962 के बाद शिक्षा में वह नगरीकरण में छुटपुट प्रगति ने इस दौर के आंदोलन को नया स्वर दिया।
क्षेत्रीय दलों की नासमझी की चूक का खामियाजा वह भी भुगत रहे हैं और राज्य की जनता भी। जिसने राज्य के लिए अपना सबकुछ दाव पर लगा दिया था भुगत रही है।
यह समझना जरूरी है की उत्तराखंड राज्य गठन के बाद शासन में हाय पार्टी ने अपने कार्य कल्पना से यह साबित कर दिया कि आलोक तांत्रिक ढंग से गठित तथा एक सांप्रदायिक दल द्वारा नियंत्रित ऐसे दल की सरकार जिसका जन आंदोलन से कोई सरोकार न हो नवगठित राज्य के विकास में सबसे बड़ा रोड है। राजधानी के मसले पर वह राज्य के नाम तक के संबंध में सरकारों द्वारा लिया गया कर व इनके जन्म विरोधी चेहरे को बेनक़ाब करता है। राज्य की सीमाओं के बारे में समय-समय पर दिए जाने वाले बयान भी राज्य की जनता के बीच में वैमनस्य फैलाने की साजिश ही है। एक बहुभाषी, बहुधार्मिक बहुजातीय राज्य की जनता का भाईचारा विकास के संघर्ष को आगे बढ़ाने की पहली कड़ी है। देश के अंदर और राज्य के अंदर भी राजनीतिक शक्तियों का संतुलन जनपक्षीय करने की आवश्यकता बनी हुई है राजधानी का प्रश्न, राज्य सूची द्वारा प्रदत्त संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न, विकासोन्मुखी जनपदों का गठन आदि प्रश्न एक जनपक्षीय राजनीतिक विकल्प और प्रगति का आधार बन सकते हैं। आपसी सद्भाव तथा राज्य की जनता की संघर्षशील परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ही विकास की चुनौती को आगे बढ़ाया जा सकता है जनवादी संघर्ष केवल चुनावी संघर्ष नहीं है इस तरह के विकास की प्राथमिक धुरी है।
चौबीस साल उत्तराखंड के जिस पर्वतीय क्षेत्र के विकास को लेकर उत्तर प्रदेश में आंदोलन चला जो राज्य निर्माण के आंदोलन में परिवर्तित हुआ और शहादतों के बाद 9 नवंबर 2000 को राज्य गठन हुआ। बीते 24 सालों में राज्य का पर्वतीय क्षेत्र उत्तर प्रदेश से भी अधिक क्षेत्रवाद का शिकार हो गया है अब तो कोई इस सवाल को उठाता भी नही है। विकास के प्रश्न पर विचार करते हुए सामान्यतः खेती पर्यटन जंगल जल जमीन ऊर्जा उद्योग जैसे विषय सामने आते हैं साथ ही वित्तीय संसाधनों की परिकल्पना होती है परंतु आवश्यकता इस बात की है कि हम विकास की चुनौती को स्वीकारते हुए संघर्ष के सूत्रों को पहचानने का प्रयास करें किसी भी प्रगति को हासिल करने के लिए कार्यकारी योजना तो जन संघर्ष पर ही आधारित होती है।
रतनमणी डोभाल

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